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झारखंड


हर साल 80 से 120 करोड़ रुपये सिर्फ चापाकलों के मेटेंनेंस और रीपेयरिंग में खर्च करती है सरकार

पेयजल और स्वच्छता विभाग ने 10 वर्षों में सिर्फ रीपेयरिंग के नाम पर खर्च किये हैं 800 करोड़ से अधिक
हर साल 80 से 120 करोड़ रुपये सिर्फ चापाकलों के मेटेंनेंस और रीपेयरिंग में खर्च करती है सरकार
दीपक, न्यूज11 भारत

 

रांचीः झारखंड के सभी 24 जिलों में 4.75 लाख से अधिक ट्यूबवेल हैं. इसमें 20 प्रतिशत का इजाफा प्रत्येक वर्ष किया जाता है. ये ट्यूबवेल ग्रामीण इलाकों में पेयजल और स्वच्छता विभाग की तरफ से लगाये गये थे. विभागीय आंकड़ों को मानें, तो हरेक साल एक लाख ट्यूबवेल गरमी के दिनों में खराब हो जाते हैं और सड़े हुए राइजर पाइप को बदलने के लिए 80 से 100 करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं. विभाग के सभी 35 प्रमंडलों में इसके लिए निविदा निकाली जाती है और इतनी राशि खर्च की जाती है. इन तमाम कोशिशों के बाद भी झारखंड के 45 सौ पंचायतों में 24 घंटे सातों दिन पानी की उपलब्धता संभव नहीं हो पा रहा है. आंकड़ों पर ही गौर करें, तो सिर्फ खराब पड़े चापाकलों की मरम्मत और रिपेयरिंग में आठ सौ करोड़ से अधिक की राशि खर्च की जा चुकी है. यह अनवरत सिलसिला लगातार जारी है. गरमी के दिनों की तैयारियां विभाग की तरफ से हर साल की जाती है. राज्य में अब तक दो बार सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई थी, उस समय भी आपदा प्रबंधन विभाग के कोष से खराब पड़े चापाकलों की मरम्मत करायी गयी थी. 

 


 

झारखंड में 4.75 लाख ट्यूबवेल के अलावा प्रत्येक पंचायतों में पांच-पांच उच्च प्रवाही नलकूपों (एचवाइडीटी) की स्थापना की गयी थी. यानी 10 हजार से अधिक छह इंच वाले बोरिंग के जरिये पीने का पानी उपलब्ध कराने की योजना सरकार ने बनायी थी. इन बोरिंग में 4.25 लाख के प्राक्कलित राशि (इस्टीमेटेड वैल्यू) के आधार पर सभी बोरवेल में दो-दो हजार लीटर की दो पानी की टंकी, एक हार्स पावर का सोलर आधारित मोटर पंप औऱ पैनल बोर्ड और मीटर लगाना था. इसके लिए पानी की टंकी रखने के लिए स्ट्रक्चर भी बनाना था. सब कुछ बना भी. पर अब भी राज्य के दुर्गम इलाकों में ये बोरवेल लगातार फेल हो रहे हैं. सरकार की तरफ से पांच हजार लीटर से अधिक के पानी के फ्लो की पात्रता रखी गयी थी. प्रत्येक एचवाइडीटी योजना में दो टैप (नल) भी लगाने की जवाबदेही संबंधित ठेकेदारों की थी. बाद में इस इस्टीमेट में सरकार की तरफ से बढ़ोत्तरी भी की गयी. ये सब कुछ ग्रामीण इलाकों का मामला है. इतना ही नहीं अब विभाग की तरफ से जल जीवन मिशन के तहत सिंगल विलेज योजना और मल्टी विलेज योजना संचालित की जा रही है. 

 

2024 तक विश्व बैंक ने सतही जल से ही घरों तक पानी पहुंचाने की बातें कही थीं

विश्व बैंक ने 2024 तक ट्यूबवेल पर निर्भरता कम करने को लेकर सतही जल पर आधारित जलापूर्ति व्यवस्था बहाल करने का निर्देश दिया था. इसके बाद ही केंद्र सरकार ने पहले राष्ट्रीय ग्रामीण जलापूर्ति योजना और अब जल जीवन मिशन संचालित कर रही है. इस योजना में सतही जल और अन्य पानी के स्त्रोतों से न्यूनतम 25 घरों तक टैप वाटर की सुविधा बहाल करना है. झारखंड में भी इस योजना को संचालित किया जा रहा है. सरकार की तरफ से 22 सौ करोड़ से अधिक की योजना को क्रियान्वित करने की योजना भी शुरू की गयी है. इसको लेकर कई जिलों में अब तक निविदा भी निकाली जा चुकी है.

 

विश्व बैंक संपोषित योजना हुआ बंद

विश्व बैंक संपोषित योजना के तहत रामगढ़, खूंटी, सरायकेला-खरसांवा, सिमडेगा समेत पांच जिलों में 15 सौ करोड से अधिक की योजना पेयजल और स्वच्छता विभाग ने शुरू की थी. इसी में बागबेड़ा, खूंटी और अन्य जगहों की योजनाएं ली गयी थीं. बाद में धीमी प्रगति को देखते हुए विश्व बैंक ने इस योजना को फंड देने से बंद कर दिया गया. 280 करोड़ की बागबेड़ा योजना आज भी पूरी नहीं हो सकी है. स्थानीय लोग अब भी पीने के पानी को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. जानकारी के अनुसार इसको लेकर राज्य सरकार ने एक विशेष सेल का गठन किया था. इसमें आइएफएस अधिकारी के नेतृत्व में एक विशेष सेल का गठन रांची के एक बहुमंजिली इमारत में खोला गया था. इसमें 50 से अधिक अभियंताओं को प्रतिनियुक्त किया गया था. दो साल तक सेल ने काम किया. बाद में इस सेल को ही बंद कर दिया गया, क्योंकि 1.25 लाख रुपये के मासिक किराये पर स्पेश लिया गया था, जहां कार्यालय खोला गया था.

 
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